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कम सुनने वालों के लिए ‘हियरिंग एड’ वरदान

नयी दिल्ली. आंशिक अथवा पूर्ण रूप से सुन पाने में असमर्थ लोगों के लिए ‘ हियरिंग एड ’ न केवल वरदान साबित हुये हैं बल्कि उन्हें हीनता के अवसाद से छुटकारा दिला रहे हैं और इनका जितना जल्द इस्तेमाल शुरू कर दिया जाये उतना ही फायदेमंद है.
कान, नाक एवं गला (ईएनटी) विशेषज्ञ एवं सर्जन डॉ. एस के अहलूवालिया का कहना है कि अचानक से कम सुनायी देना अथवा किसी की बात एक बार में न सुन पाना हियरिंग लॉस ( सुनने की क्षमता में कमी) का लक्षण है. अधिकतर मामलों में ऐसा होता है कि जब व्यक्ति को अपने कम सुन पाने का अहसास होता है, तब तक कानों से जुड़ी 30 प्रतिशत कोशिकाएं नष्ट हो चुकी होती है. एक बार नष्ट हुई कोशिकाओं को दोबारा प्राप्त नहीं किया जा सकता और इसका परिणाम यह होता है कि व्यक्ति के सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है, लेकिन समय रहते इसका उपचार करवा लिया जाये तो इस क्रम काे नियंत्रित किया जा सकता है.
डॉ. अहलूवालिया ने कहा कि आजकल मोबाइल पर गाने सुनने के लिए ईयरफोन का प्रचलन जोरों पर है और 10 में से आठ युवा कानों में ईयरफोन लगाये गाने सुनते नजर आते हैं. यहां तक कि मोबाइल पर बातचीत के दौरान भी वे ईयरफोन और माउथपीस का सहारा लेते हैं. ईयरफोन पर घंटों गाने सुनना, डीजे की तेज वाल्यूम के बीच पार्टी करना जैसी आदतों के कारण भी व्यक्ति की श्रवण क्षमता धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है जिसका उन्हें अहसास भी नहीं होता और जब तक वे इसके परिणामों से अवगत होते हैं, तब तक काफी देर हाे चुकी होती है.
उन्होंने कहा कि जिन लोगों को कम सुनायी देता है उनके लिए हियरिंग एड काफी सहायक होता है. दीर्घकाल तक हियरिंग एड के इस्तेमाल से व्यक्ति की रही-सही श्रवण-क्षमता नष्ट हो जाने संबंधी आशंकाओं को खारिज करते हुए उन्होंने कहा कि कम सुनने वाला व्यक्ति अगर हियरिंग एड लगाना शुरू कर देता है तो एक साल में जो हियरिंग लॉस होता है उसे पांच साल तक टाला जा सकता है.
हियरिंग एड चिकित्सकों की सलाह और ऑडियो टेस्ट के आधार पर लगाये जाते हैं. आॅडियोलॉजिस्ट व्यक्ति की श्रव्य क्षमता का परीक्षण करते हैं. इसके तहत दोनों कानों के सामने और पीछे की ओर से सुनने की क्षमता का आकलन किया जाता है. शून्य से 120 डेसीबल के बीच की ध्वनि को सुन पाने की क्षमता को आॅडियो टेस्ट के जरिये मापा जाता है. ऑडियो टेस्ट के लिए ध्वनि के निर्धारित मानक के आधार पर 10 से 15 डेसीबल को सामान्य माना जाता है तथा इससे अधिक होना श्रवण क्षमता में कमी का सूचक है.
ऑडियोलाजिस्ट प्रदीप चौधरी ने बताया कि डिजीटल माॅडल के हियरिंग एड में व्यक्ति की सुनने की क्षमता के हिसाब से कम्पयूटर के जरिये इसकी फ्रीक्वेंसी लोड की जाती है. यही फ्रीक्वेंसी आसपास की ध्वनि को मस्तिष्क के केंद्र से जुड़ी कानों की कोशिकाओं तक पहुंचाती है और यह व्यक्ति को सूक्ष्म ध्वनि भी सहज सुनायी देने लगती है. ऐनालॉग माॅडल में हियरिंग एड का वाल्यूम मैनुअल तरीके से सेट किया जा सकता है.
चौधरी ने बताया कि हियरिंग एड विशेष रूप से एेनालॉग और डिजीटल दो तरह की होती है. मुख्यत: चार तरह के श्रवण यंत्र होते हैं, जिसमें बीटीई , ईटीई और आईआईई प्रमुख माडल है. बीटीई यंत्र कान के बाहरी हिस्से में लगता है और सामने की ओर से दिखायी नहीं देता है जबकि ईटीई कान के भीतर लगाया जाता है तथा बाहर से दिखायी नहीं पड़ता. आईआईई सिस्टम का यंत्र नयी तकनीक वाला है जिसे कानों के भीतर फिट किया जाता है और यह बिल्कुल भी नजर नहीं आता.
तकनीकी खूबियों और सुविधा के हिसाब से इनकी कीमत होती है जो कमोबेश 10 हजार से तीन लाख रुपये तक है. इनमें पाकेट साइज श्रेणी के यंत्र पुरानी शैली के हैं, हालांकि अभी भी इनका उपयोग हो रहा है. पाकेट साइज हियरिंग एड ऐनालाग तकनीक वाला है और वर्तमान में इसका चलन बहुत कम है. यह यंत्र 500 रुपये से तीन हजार रुपये में मिल जाते हैं. सरकारी और निजी स्तर पर संचालित मूक-बधिर पुनर्वास केंद्र की ओर से ये वांछितों को सहायता के बतौर उपलब्ध कराये जाते हैं.
एक अध्ययन के मुताबिक कम सुनायी देने की एक प्रमुख वजह हेयरबड्स का बहुतायत से इस्तेमाल करना भी है. लोग कानों की सफाई के लिए ईयरबड्स का उपयोग करते हैं, लेकिन वे नहीं समझते कि यह ईयरबड्स ईयरवैक्स(कान के भीतर मैल) को और भीतर की ओर कर देता है. इससे कानों के परदों अथवा सूक्ष्म कोशिकाओं को नुकसान भी पहुंच सकता है और कानों के भीतरी हिस्सों में संक्रमण भी फैल सकता है.
अध्ययन में यह तथ्य भी सामने आया है कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में पिछले 20 सालों के दौरान कानों में संक्रमण से पीड़ित करीब ढाई लाख से अधिक बच्चे अस्पताल में भर्ती हुए. औसतन 12 हजार बच्चे ईयरबड्स से संक्रमण की शिकायत पर अस्पताल में अपना उपचार कराते हैं.

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