Navabharat – Hindi News Website
No Comments 12 Views

ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित कृष्णा सोबती ने कहा, ‘युवाओं को मिले पुरस्कार’

नयी दिल्ली. हिन्दी की प्रख्यात कथाकार एवं साहित्य में स्त्री स्वर को विशिष्ट पहचान देने वाली कृष्णा सोबती को आज यहाँ उनकी अनुपस्थिति में 53वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. सोबती (92) की अचानक तबियत ख़राब होने के कारण दो दिन पूर्व उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा, जिसके कारण उनकी ओर से यह पुरस्कार हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक एवं संस्कृति कर्मी अशोक वाजपेयी ने ग्रहण किया. भारतीय ज्ञानपीठ न्यास के अध्यक्ष एवं न्यायमूर्ति विजेंद्र जैन और मशहूर आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने वाजपेयी को यह पुरस्कार दिया. पहले यह पुरस्कार राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को प्रदान करना था, किन्तु किन्ही अपरिहार्य कारणों से वह नहीं आ सके. वाजपेयी ने सोबती के लिए वर्ष 2017 के लिए इस प्रतिष्ठित पुरस्कार में 11 लाख रुपये का चैक, वाग्देवी की प्रतिमा, एक प्रशस्ति पत्र और ताम्र फलक और श्रीफल ग्रहण किया और उन्हें शाल भी ओढाया गया. वाजपेयी ने इस अवसर पर सोबती का विस्तृत वक्तव्य भी पढ़कर सुनाया, जिसमें उन्होंने ज्ञानपीठ परिवार से कहा कि मेरा सुझाव है कि यह सम्मान भारतीय भाषाओं के वरिष्ठ लेखकों के दिए जाने की परिपाटी को बदलकर उन लेखकों को दिया जाये जो अपेक्षाकृत युवा हैं, पर जिनकी उपलब्धियां ऐसे सम्मान की पात्र हैं. उन्होंने कहा कि लेखक होना जितना सहज दिखता है, वह उतना आसान नहीं, लेखक एक बड़ी दुनिया को अपने में समेटे रहता है और वह किसी के दवाब में नहीं, बल्कि स्वेच्छा से लिखता है और उसे अपने समय और काल से जोड़ता है. ज्ञानपीठ प्रवर समिति के अध्यक्ष डॉ नामवर सिंह ने कहा कि सोबती विभाजन के बाद पाकिस्तान के लाहौर से दिल्ली आयी थीं. उस समय और भी कई लेखक दिल्ली आये थे और उस दौर के बारे में कथा साहित्य में लिखा था. डॉ सिंह ने उनके गद्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि वह उनकी भाषा की दाद देते हैं. जिस तरह के वाक्य वह लिखती हैं, वे सिक्के की तरह चमकते हैं और उनमें कोई शब्द फालतू नहीं होता. ज्ञानपीठ के न्यासी स्वदेश जैन ने साहित्य के विकास में ज्ञानपीठ के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि आज उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने श्रवणबेलगोला में गोमेतेश्वर की प्रतिमा के महामास्तिभिषेक के दौरान जैन साहित्य की 108 पुस्तकों का विमोचन किया और भारतीय ज्ञानपीठ की सराहना की, समारोह को न्यायमूर्ति जैन ने भी संबोधित किया, धन्यवाद ज्ञापन प्रबंध न्यासी अखिलेश जैन ने दिया. मंच पर ज्ञानपीठ की आजीवन न्यासी अपराजिता जैन महाजन भी मौजूद थी. सोबती, महादेवी वर्मा के बाद हिन्दी की दूसरी लेखिका हैं जिन्हें यह सम्मान मिला. अब तक हिन्दी में सुमित्रानंदन पन्त, दिनकर, अज्ञेय, निर्मल वर्मा, कुंवर नारायण, अमरकांत, श्रीलाल शुक्ल और केदारनाथ सिंह को यह पुरस्कार मिला है. 1925 को पाकिस्तान की गुजरात सिटी में जन्मी सोबती अगले सप्ताह 18 फरवरी को 93 वर्ष की हो जायेंगी. इस पुरस्कार के लिए उनका चयन प्रख्यात आलोचक डॉ़ नामवर सिंह की अध्यक्षता में गठित एक जूरी ने किया जिसमें रमाकांत रथ, शमीम हनफी, गिरीश्वर मिश्र, चंद्रकांत पाटिल, मधुसूदन आनंद, आलोक राय आैर हरीश त्रिवेदी आदि शामिल थे. सोबती को 1980 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था और वह 1996 में अकादमी की फेलो बनाई गयी थी जो अकादमी का सर्वोच्च सम्मान है. उन्हें मैथिलिशरण गुप्त शिरोमणि अवार्ड तथा व्यास सम्मान आदि भी मिल चुका है. वह मितरो मरजानी, जिन्दगी नामा, डार से बिछुड़ी, सूरजमुखी अँधेरे के, बादलों के घेरे, ए लड़की, दिलो दानिश, गुजरात पाक से गुजरात हिन्दुस्तान तक, जैसी चर्चित कृतियाँ लिख चुकी हैं. उनकी रचनाओं के देशी विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुके हैं. वह अपने अनूठे गद्य और कथा शैली एवं बेबाक लेखन के लिए जानी जाती हैं. समारोह का संचालन ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई ने किया, सभागार में बड़ी संख्या में लेखक, पत्रकार और बुद्धिजीवी भी उपस्थित थे.

LEAVE YOUR COMMENT

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to Top