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सौ साल पहले गांधी जी ने किया था पहला उपवास

नयी दिल्ली. देश में तीज त्योहारों और आध्यात्मिक साधना के रुप में उपवास करने की परंपरा तो बहुत पुरानी है पर महात्मा गांधी ने राजनीतिक सामाजिक मसलों को हल करने में इसका उपयोग कर दुनिया को एक अहिंसक हथियार दे दिया जिसे अनशन भी कहा जाता है और अाज भी बहुत से लोग इसका इस्तेमाल करते हैं. स्वाधीनता आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी ने कई बार उपवास का सहारा लिया. उन्होंने पहली बार मार्च 1918 में तीन दिन का उपवास किया था जिसके सौ साल पूरे हो रहे हैं. उन्होंने यह उपवास अहमदाबाद में मिल मालिकों के खिलाफ किया था. मिल मालिकों ने मजदूरों के वेतन में 35 फीसद बढ़ोतरी करने से इंकार कर दिया था और मिलों को बंद करने की धमकी दे रहे थे. उपवास के जरिए सत्याग्रह को सफल बनाने का यह पहला प्रयोग था, इससे यह साबित हुआ कि इस हथियार के जरिये से भी किसी समस्या का समाधान प्राप्त किया जा सकता है. बाद में गांधी जी ने उपवास को सत्याग्रह का शक्तिशाली शस्त्र बनाया. उन्होंने 17 बार उपवास किया. उन्होंने अस्पृश्यता और हिंसक कार्रवाइयों के खिलाफ सबसे अधिक बार इसका इस्तेमाल किया. मिल मालिकों एवं रियासतों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ भी उन्होंने उपवास किया. अपनी मृत्यु के बाइस दिन पहले उन्होंने जनवरी, 1948 में सांप्रदायिक सद्भाव और कौमी एकता के लिए अनिश्चितकालीन उपवास शुरु किया जाे छह दिन चला. इससे पहले 1924 में भी कौमी एकता के लिये उन्होंने 21 दिनों तक उपवास किया था.
दक्षिण अफ्रीका अौर देश में किए गए उनके सभी उपवास किसी न किसी समस्या के समाधान के प्रयास की दिशा में अहिंसक प्रयोग साबित हुये . वह खुद उपवास करते थे और देशवासियों से छोटी अवधि के लिए ऐसा करने की अपील करते थे. जालियांवाला बाग में रॉलेट एक्ट के विरोध में प्रदर्शनकारियों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा गोलियां बरसाई गई थीं तब गांधी जी ने 72 घंटे का उपवास किया था और देशवासियों से भी ऐसा करने की अपील की थी.
आजादी के आंदोलन के दौरान जब कभी हिंसक घटनाएं हुईं तब गांधीजी ने इसके विरोध में उपवास किया. वर्ष 1922 में असहयोग आंदोलन के दौरान चौरी चौरा कांड हुआ तो गांधी जी ने तत्काल असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया और पांच दिनों तक उपवास किया. वह खुद को जोखिम में डाल कर भी हमेशा इस बात पर अडिग रहते थे कि किसी भी कीमत पर हिंसा नहीं होनी चाहिये. महात्मा गांधी के समकालीन पत्रकार स्टेट्समैन, दिल्ली के संपादक आर्थर मूर ने लिखा है कि चौरी चौरा में जब हिंसा भड़क उठी जो स्पष्टतः असहयोग आंदोलन की ही उपज थी तो महात्मा गांधी के पास उसका एक ही इलाज था. वह था उनका निजी उपवास. उनका विश्वास था कि उपवास से चौरी चौरा कांड के पापों का थोड़ा बहुत प्रायश्चित अवश्य हो जाएगा.
जब 1921 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान ब्रिटिश युवराज के आगमन के समय 53 लोग मारे गए और 400 लोग घायल हुए तो गांधी जी के हृदय को बड़ा आघात पहुंचा और उन्होंने प्रायश्चित के रूप में पांच दिन का उपवास किया. बाद में उन्होंने अपने उपवासों का दायरा बड़ा कर दिया. वर्ष 1924 में उन्होंने हिंदू—मुस्लिम एकता के लिए इक्कीस दिन का उपवास किया. असहयोग आंदोलन में जब उन्हें जेल भेज दिया गया तो उन्होंने उपवास से ही अपनी रिहाई कराई.
गांधी जी के दो उपवास काफी चर्चित रहे. दलितों के पृथक चुनाव क्षेत्र बनाने के विरोध में पुणे में 20 सितंबर 1932 को शुरु किया गया उपवास और जनवरी 1948 में मृत्यु से कुछ दिन पहले किया गया उपवास . ये दोनों समाज को एकजुट रखने के उद्देश्य से किए गए और इनसे सामाजिक एकता और सांप्रदायिक सद्भाव कायम करने में मदद भी मिली.
गांधी जी ने इंग्लैंड में गोल मेज सम्मेलन कहा था कि यदि सरकार हरिजनों के लिए पृथक चुनाव क्षेत्र बनाएगी तो वह अपने प्राण देकर भी हिंदू समाज को टुकड़े किए जाने से बचायेंगे. इंग्लैंड से लौटते ही उन्होंने पुणे में अनिश्चितकाली न उपवास शुरू कर दिया. उनके उपवास के पहले ही दिन पूरे देश में प्राथनाएं और उपवास किए गए. अछूतों के लिए मंदिर के दरवाजे खोल दिए गए और जगह—जगह अछूतोद्धार पर सभाएं होने लगीं. इस उपवास के चलते गांधी और आंबेडकर में पुणे समझौता हुआ, जिसे ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया, लेकिन गांधी जी ने तब तक उपवास नहीं तोड़ा, जब तक कि उसकी मंजूरी के कागज को उन्होंने खुद नहीं देख लिया. उपवास के दौरान गांधी जी को देखने रवींद्र नाथ टैगोर आए. वह गांधीजी की कमजोर हालत देखकर इतने विचलित हुए कि उनके सीने पर सिर रखकर रो पड़े.
देश के विभाजन के समय खून खराबे का सिलसिला चल रहा था तो इसे रोकने के लिये गांधी ने 12 जनवरी, 1948 की प्रार्थना सभा में गांधीजी ने अनिश्चितकालीन उपवास की घोषणा की. उन्होंने एलान किया था कि उनका उपवास तभी टूटेगा जब उन्हें विश्वास हो जाए कि मुसलमान यहां हिफाजत और इज्जत के साथ रह सकेंगे.
दक्षिण अफ्रीका में भी गांधीजी ने दो बार 1913 और 1914 में उपवास किया जो सात और 14 दिन चले. इनमें एक आश्रमवासियों के बीच अनुशासन कायम करने और पश्चाताप के लिए था, जबकि दूसरा पुलिस द्वारा हड़ताली मजदूरों की हत्या के विरोध में था.

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