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हरसिद्धि देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़

उज्जैन. मध्यप्रदेश के उज्जैन में 13वां शक्तिपीठ के रूप में हरसिद्धि माता के मंदिर में आज हजारों देवी भक्तों ने नवरात्र के पावन अवसर पर माँ हरसिद्धि देवी की दर्शन कर पूजा अर्चना की. देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख भगवान महाकाल की नगरी में माँ हरसिद्धि माता का मंदिर मोक्षदायनि क्षिप्रा मंदिर के किनारे स्थित है. पौराणिक उल्लेख शिव पुराण की मान्यता के अनुसार भगवान शंकर ने माता सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर जब उठाकर ले जा रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सती के अंगों को अपने चक्र से 52 भागों में बाँट दिया. उज्जैन के इस स्थान पर सती की कोहनी का पतन हुआ था. माता सती के 52 शक्तिपीठों में यह 13वां शक्तिपीठ है. तब से माँ यहां हरसिद्धि मंदिर के रूप में स्थापित हुईं. इस माँ की महिमा यह है कि उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य ने ग्यारह बार अपने शीश को काटकर माँ के श्रीचरणों में समर्पित कर दिया पर आश्चर्यवाहिनी माँ पुनः उन्हें जीवित व स्वस्थ कर देती थी. सम्राट विक्रमादित्य की यह आराध्य देवी थी जिन्हें प्राचीन काल में ‘मांगलचाण्डिकी’ के नाम से जाना जाता था. सम्राट विक्रमादित्य अपनी बुद्धि, पराक्रम और उदारता के लिए जाने जाते थे. इन्हीं के नाम से विक्रम संवत सन की शुरुआत हुई. भगवान महाकाल के दर्शन के साथ ही यह शक्तिपीठ बारह मास भक्तों की भीड़ से भरा होने के कारण ऊर्जा का बहुत बड़ा स्त्रोत माना जाता है. तंत्र साधकों के लिए यह स्थान विशेष महत्व रखता है. धर्म और अध्यात्म की इस प्राचीन नगरी में भगवान महाकाल की महिमा के साथ ही यहां नवरात्री का त्यौहार धूम-धाम और आस्था के साथ मनाया जाता है. सैकड़ों दीपक एकसाथ नवरात्री के नौ दिन जलाये जाते हैं जिससे अद्भुत और दिव्य दृश्य का निर्माण होता है. जनश्रुतियों में कहा गया है कि हरसिद्धि माता सभी भक्तों और श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण करती हैं. नवरात्र के पावन त्यौहर पर माँ की विशेष महिमा रहती है श्रद्धालु अपनी परिवार की मंगल कामनओं के लिए दूर-दूर से यहां आते है. देवी के भक्तों का मानना है कि जो भक्त सच्ची आस्था लेकर यहां आता है. माँ की कृपा उस पर बनी रहती है. उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. आस्था व श्रद्धा भक्ति की महिमा में माँ के इस मंदिर के गर्भगृह के सामने सभाग्रह में यन्त्र निर्मित है. कहा जाता है कि यह सिद्ध यन्त्र है और इस यन्त्र के दर्शन मात्र से ही पुण्य का लाभ होता है. शुभफल प्रदायिनी इस मंदिर के प्रांगण में शिवजी का कर्कोटकेश्वर महादेव मंदिर भी है जो कि चौरासी महादेव में से एक है जहां कालसर्प दोष का निवारण होता है ऐसे में यह लोगों की अस्था व विश्वास का केन्द्र है. मंदिर प्रांगण के बीचोंबीच दो अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है जिनका दर्शन भक्तों के लिए शांतिदायक रहता है. मराठाकालीन इस मंदिर के प्रांगण के चारों दिशाओं में चार प्रवेश द्वार है एवं मुख्य प्रवेश द्वार के भीतर हरसिद्धि सभाग्रह के सामने दो दीपमालाएँ बनी हुई है. यह दीपमालिकाएं मराठाकालीन हैं. इस प्राचीन मंदिर के केंद्र में हल्दी और सिन्दूर कि परत चढ़ा हुआ पवित्र पत्थर है. यह आस्था का केंद्र है. माँ का यह मंदिर महाकाल के पास स्थित है. जो श्रद्धालु भगवान महाकाल के दर्शन के लिए आते हैं वे यहां आकर अपनी मनोकामनाओं कि पूर्ति हेतु दर्शन लाभ लेते हैं. श्रद्धालु भक्त तन के साथ-साथ मन को शुद्ध करते हैं. नवरात्र पर्व पर सुबह में श्रद्धालु महिलाएं लोटे में जल भर हरिसिद्ध माता को चढ़ाने जाती है. मोक्षदायनी शिप्रा के तट पर इस शक्तिपीठ में नवरात्र पर माँ की विशेष महिमा रहती है. यही कारण है कि न केवल मालावंचल के लोग बल्कि दूसरे प्रदेशों से श्रद्धालु अपने परिवार की मंगलकामनाएं के लिए माँ के श्रीचरणों में सिर झुकाने आते है.

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