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‘प्रतापधन’ से गरीबों की आय बढी, कुपोषण घटा

नयी दिल्ली. राजस्थान में गरीबों विशेषकर आदिवासियों की आर्थिक स्थिति बेहतर बनाने और कुपोषण की समस्या दूर करने के लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से घरेलू मुर्गी पालन को बढावा दिया जा रहा है तथा ‘प्रतापधन’ की बिक्री से लोग 600 से 800 रुपये अर्जित कर रहे हैं. जलवायु की दृष्टि से देश के अन्य हिस्सों से अधिक गर्म और रेगिस्तान वाले इस राज्य में ‘प्रतापधन’ को मुर्गी की स्थानीय नस्ल मेवाड़ी और अमेरिकी नस्ल ‘रोड आइसलैंड रेड’ से क्रास कर तैयार किया गया है जिसका मांस लजीज स्वाद का है और प्रोटीन, विटामिन एवं अन्य पोषक तत्वों से भरपूर है. मांस और अंडा दोनों प्राप्त करने के उद्देश्य से इसे घर आंगन के साथ साथ पाल्ट्री फार्म में भी पाला जा रहा है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की अखिल भारतीय समन्वित कुक्कुट प्रजनन अनुसंधान परियोजना के तहत राजस्थान के महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर ने ‘प्रतापधन’ को विकसित किया है. इस अनुसंधान से जुड़े प्रोफेसर सिद्धार्थ मिश्र ने बताया कि लम्बी टांग वाली यह मुर्गी रंगबिरंगे पंखों वाली है जो देखने में खूबसूरत है और गांव के लोगों को यह बेहद पसंद है. प्रो मिश्र ने बताया कि घर आंगन में पाले जाने वाला ‘प्रतापधन’ मुर्गा 20 सप्ताह में ढाई से तीन किलोग्राम का हो जाता है जबकि मुर्गी इसी अवधि के दौरान डेढ से दो किलोग्राम तक वजन प्राप्त कर लेती है. एक मुर्गी साल में 150 से 160 अंडे तक देती है जबकि आम तौर पर पहले आदिवासी जिन देसी नस्ल की मुर्गियों को पालते थे वे साल में औसतन 43 अंडे ही देती थी. प्रतापधन मुर्गियां 125 दिन में अंडे देने लगती हैं जो भूरे रंग का होता है और इसका औसत वजन 50 ग्राम होता है. अंडे से 21 दिन में चूजा तैयार हो जाता है. प्रो. मिश्र ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र के अलावा पशु पालन विभाग की ओर से प्रतापधन कुक्कुट की भारी मांग है लेकिन उसकी तुलना में विश्वविद्यालय इसकी आपूर्ति नहीं कर पा रहा है. दूसरे राज्यों से भी इस नस्ल की भारी मांग है पंजाब , गुजरात और जम्मू कश्मीर को इसकी आपूर्ति भी की गयी है. लजीज स्वाद के कारण आमतौर पर लोग इसे बेहद पसंद करते हैं. विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लेकर इसका व्यवसाय करने वाले आदिवासियों ने बताया कि एक मुर्गे की कीमत 600 से 800 रुपये तक मिल जाती है. प्रो मिश्र ने बताया कि आदिवासी एक बार में 15-20 चूजे पालना पसंद करते हैं और कुछ समय बाद उन्हें बेचते रहते हैं तथा उसी अनुपात में वे नये चूजे लेते हैं. उन्होंने कहा कि त्योहार आदि के अवसर पर लोगों को एक मुर्गे का मूल्य 1000 रुपये तक मिल जाता है. विश्वविद्यालय किसानों को छह सप्ताह का चूजा उपलब्ध कराता है जो रोगमुक्त होता है. ऐसे चूजों में मरने का खतरा बहुत कम होता है. किसानों को एक चूजा 85 रुपये में दिया जाता है. किसान चाहें तो उसे एक दिन का चूजा भी कम कीमत पर दिया जा सकता है. ऐसे चूजों का वजन 35 ग्राम तक होता है. प्रो मिश्र ने बताया कि आदिवासी क्षेत्रों में खानपान के प्रति लोगों के जागरुक नहीं होने के कारण कुपोषण की समस्या है. ऐसा देखा गया है कि मुर्गी पालन का व्यवसाय करने वाले परिवारों की न केवल आर्थिक स्थिति बेहतर हुयी है बल्कि कुपोषण भी काफी हद तक दूर हो रहा है.

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