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योगी की वजह से इस बार खिचड़ी मेले में की जा रहीं विशेष तैयारियां

गोरखपुर. उत्तर प्रदेश के बाबा गोरखनाथ की नगरी गोरखपुर में नाथ सम्प्रदाय के गुरू गोरक्षनाथ मंदिर में परम्परागत रूप से मकर संक्रान्ति के अवसर पर लगने वाले खिचडी मेले की तैयारियां जोरों पर है. इस बार गोरक्षपीठाधीश्वर ही राज्य के मुख्यमंत्री हैं इसलिये मेंले की रौनक अधिक रहने की सम्भावना है,हालांकि हर वर्ष की अपेक्षा इस बार सुरक्षा व्यवस्था चुस्त रहने के कारण श्रद्धालुओं को थोडी कठिनाई हो सकती है. लेकिन, भीड में कमी नहीं होने के दावे किये जा रहे हैं. मकर सक्रान्ति पर मंदिर में चावल, दाल और तिल चढ़ाने की परम्परा है. इसके लिये लाखों श्रद्धालु जुटते हैं. प्रतिवर्ष 14 या 15 जनवरी को सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ ही नाथ सम्प्रदाय के प्रसिद्ध शिवावतारी गोरक्षनाथ मंदिर में परम्परागत रूप से खिचडी चढाने का क्रम शुरू हो जाता है. निर्धारित मुहूर्त में सबसे पहले गोरक्षपीठाधीश्वर द्वारा खिचडी चढायी जाती है. इस वर्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ बतौर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा सबसे पहले खिचडी चढायी जायेगी. खिचडी चढाने को लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश सहित बिहार, उत्तराखंड, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, गुजरात समेत अन्य प्रान्तों के अलावा पडोसी देश नेपाल से बडी संख्या में श्रद्धालुओं का जनसैलाब गोरखनाथ मंदिर में एकत्र होगा. मान्यता के अनुसार योगी गोरखनाथ हिंमाचल प्रदेश के कांगडा के ज्वाला मंदिर से भ्रमण के बाद गोरखपुर आये थे और यहीं से उन्होंने अपने योग स्थल पर मकर संक्रान्ति के दिन खिचडी चढाने की शुरूआत की थी. श्रद्धालु मंदिर परिसर में स्थित भीम सरोवर में पहले स्नान करते हैं और उसके बाद योगी गोरखनाथ का दर्शन करने के बाद खिचडी चढाते हैं. इस भीम सरोवर में देश के सभी पवित्र नदियों का पानी डाला गया है. इस अवसर पर गोरखनाथ मंदिर परिसर में 15 जनवरी से एक माह तक चलने वाला भव्य मेला भी शुरू हो जाता है जिसे खिचडी मेला कहा जाता है. मान्यता के अनुसार व्रतों और पर्वों की लम्बी वैविध्यपूर्ण परम्परा में मकर संक्रान्ति का भी विशिष्ट महत्व है. सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तब मकर संक्रान्ति का पर्व आता है. अर्द्धरात्रि के बाद जब संक्रान्ति पड़ती है तो पुण्यकाल दूसरे दिन ही मनाया जाता है. संक्रान्ति का पर्व मूलतः जगत् पिता सूर्य की उपासना का ही महापर्व है. वर्ष में दो अयन उत्तरायण और दक्षिणायन होते हैं. मकर राशि में जब सूर्य की संक्रान्ति होती है तब से मिथुन राशि तक छह मास पर्यन्त सूर्य उत्तरायण रहता है. यह काल कई प्रकार के धार्मिक संस्कारों और अनुष्ठानों के लिये शुभ माना जाता है. सूर्य के उत्तरायण होने के दिन से ही रातें छोटी और दिन बड़ा होने लगता है. माघ मास में सूर्य जब मकर राशि में प्रवेश करता है तब इस पुण्यकाल में स्नान-दान का विशेष महत्व है. देश के विभिन्न भागों में अलग-अलग नामों एवं अनुष्ठानों के साथ यह पर्व बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है. हिन्दीभाषी क्षेत्रों में जहां प्रायः इसे खिचड़ी अर्थात् चावल व दाल के मिश्रण के दान एवं भोजन से सम्बन्धित संक्रान्ति कहते हैं वहीं महाराष्ट्र में इस अवसर पर तिल और गुड़ का विशेष प्रयोग होता है. उधर बंगाल में इसे तिलवा संक्रान्ति कहते हैं, जबकि दक्षिण भारत में इस अवसर पर तीन दिनों तक चलने वाला महोत्सव पोंगल के नाम से प्रसिद्ध है. पंजाब में लोहड़ी के नाम से इस पर्व को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. धर्म शास्त्रों के अनुसार जिस दिन संक्रान्ति हो उस दिन संकल्प पूर्वक वेदी या चौकी पर लाल कपड़ा बिछा कर अक्षतों का अष्टदल बनाना और उसमें सूर्य भगवान की मूर्ति स्थापित कर उनका पंचोपचार विधि से पूजन करना चाहिये. इस दिन गंगा स्नान, दाल, चावल और काले तिल का दान बड़ा पुण्य प्रदायी कहा गया है. शास्त्रों में मकर संक्रान्ति में वस्त्र के विशेष दान का भी विधान है. ठंड अधिक होने के कारण इसका दान महत्वपूर्ण माना गया है जिससे कि गरीबों को भी ठंड से बचने के लिये वस्त्र प्राप्त हो सकें. संक्रान्ति काल के दिन समुद्र, गंगासागर, काशी और तीर्थराज प्रयाग में स्नान का विशेष महत्व है. मकर संक्रान्ति का जहां कई धार्मिक अनुष्ठानों के कारण तथा लोक-परलोक में उत्तम गति देने वाला होने के कारण भी विशेष महत्व है. यह पर्व प्रायः पूरे देश में यह बड़े उत्साह और श्रद्धा-विश्वास के साथ मनाया जाता हैं वहीं इस पुण्य पर्व का शिवावतार महायोगी गोरखनाथ जी और गोरखपुर में विशेष महत्व है. श्रद्धा और भक्ति तथा उत्तरवर्ती नाथ सन्तों की लोकप्रियता के कारण धीरे-धीरे संक्रान्ति के पर्व पर यहां नाथ जी के मन्दिर में भारी संख्या में लोगों के आने के साथ-साथ कई दिनों तक चलने वाले मेले का भी आयोजन विगत कई सौ वर्षों से होता चला आ रहा है जिसमें लाखों लोग जुटते हैं. इतिहासविदों के अनुसार नेपाल का राजवंश गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से ही अस्तित्व में आया था. इसके संस्थापक राजा पृथ्वीनारायण शाह गुरू गोरखनाथ जी के आशीर्वाद से ही बाइसी और चौबीसी के नाम से विभक्त 46 छोटी-छोटी रियासतों का एकीकरण कर नेपाल का निर्माण करने में समर्थ हुये थे. नाथ जी की इसी कृपा की स्मृति में नेपाल में राजमुद्रा में और राजमुकुट में गोरखनाथ जी का नाम और उनकी चरण पादुका अंकित रहती है. महायोगी गोरखनाथ जी का प्रभाव केवल भारत ही नहीं म्यांमार, चीन, मंगोलिया और कई अन्य देशों में है. मकर संक्रान्ति के अवसर पर प्राचीन काल से ही यहां प्रति वर्ष श्रद्धालुओं का मेला लगता है. भीम सरोवर में स्नान और नाथ जी का दर्शन करने आये लाखों लोग मन्दिर में इस अवसर पर खिचड़ी चढाते हैं. मकर संक्रान्ति के दिन आने वाले दर्शनार्थियों की सुविधा को देखते हुये मन्दिर, प्रशासन तथा स्वयं सेवी संस्थाओं की ओर से पूरी व्यवस्था की जाती है. मन्दिर में महायोगी गुरू गोरखनाथ द्वारा जलाई गयी अखण्ड ज्योति त्रेता युग से आज तक अनवरत अनेक झंझावतों एवं प्रलयकारी आपत्तियों के थपेड़े खाकर भी अखण्ड रूप से जल रही है. मन्दिर के अन्तर्वती भाग में कुछ देव मूर्तियाँ प्रतिष्ठित हैं. मन्दिर के दक्षिण द्वार के पूर्व में भगवान शिव नटराज की भव्य मांगलिक मूर्ति प्रतिष्ठित है. भगवान गणेश जी की मूर्ति स्थापित है. परिसर में ही एक आधुनिक चिकित्सा सुविधा से युक्त 300 बिस्तर का गुरू गोरक्षनाथ धर्मार्थ चिकित्सालय तथा महन्त दिग्विजयनाथ आयुर्वेद चिकित्सालय, देववाणी संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन के लिये संस्कृत महाविद्यालय भी है. गोरखनाथ मन्दिर परिसर में गोरक्षनाथ शोध संस्थान भी स्थापित है. योग के प्रचार-प्रसार के लिये मन्दिर से विशेष रूप से योग साहित्य और एक मासिक पत्रिका योगवाणी का भी प्रकाशन किया जाता है. मन्दिर परिसर में ही गोवंश की सेवा के लिये महायोगी गुरू गोरक्षनाथ गौ सेवा केन्द्र भी है जिसमें 300 से अधिक भारतीय नस्ल की गोवंश की देखभाल एवं सेवा होती है. इस प्रकार योग, धर्म, अध्यात्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रीयता और सामाजिक समरसता के प्रचार-प्रसार में अधिकाधिक समर्पित गोरखनाथ मन्दिर आज भारत के धर्माकाश में अपनी निष्ठा, स्वच्छता और सुव्यवस्था के लिये कीर्तित होता हुआ लोक-संग्रह के कार्य में लगा हुआ है. मेले में बिहार, दिल्ली, कोलकाता, पंजाब आदि प्रान्तों से दुकानदार आते हैं और सुरक्षा के मद्देनजर मेले में जाने वाले श्रद्धालुओं को मेटल डिटेक्टर से होकर गुजरना पड रहा है. भारी संख्या में पुलिस पीएसी के जवानों को तैनात किया गया है. मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की काफी संख्या में आने के मददेनजर यातायात पुलिस ने गोरखनाथ क्षेत्र में यातायात व्यवस्था में फेरबदल भी किया है. इसी बीच गोरखपुर जोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल ने आज “यूनीवार्ता” से कहा कि खिचडी मेले में आने वाले श्रद्धालुओं की मदद के लिए इस साल पर्यटक पुलिस तैनात की जायगी. इसके लिए जिला पुलिस से अंग्रेजी बोलने और समझ सकने वाले युवा सिपाहियों का चयन किया जायेगा. सफेद मोटरसाइकिल से भ्रमणशील ये सिपाही श्रद्धालुओं को ठहरने के लिए होटल और धर्मशाला के बारे में जानकारी तो देंगे ही और आस पास के पर्यटक स्थलों और वहां आने जाने के साधनों के बारे में भी बतायेंगे. उन्होंने बताया कि इसके लिए फिलहाल 12 सिपाहियों का चयन किया जा रहा है. उन्होंने बताया कि मेले में खिचडी चढाने आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा का ध्यान रखने के साथ ही उनके लिए यह पुलिकर्मी गाइड का भी काम करेंगे. अन्य पुलिस वालों से इन्हें अलग करने के उददेश्य से इनकी अलग से वर्दी तैयार करायी जा रही है. वर्दी पर रेडियम पटटी लगी होगी ताकि रात में दूर से ही इनकी पहचान की जा सके. अग्रवाल ने बताया कि खिचडी मेला समाप्त होने पर भी इन पुलिसवालों को गोरखनाथ मंदिर में तैनात किया जायेगा ताकि खिचडी मेले के बाद भी मंदिर में देश के विभिन्न हिस्सों और दूसरे देश से आने वाले श्रद्धालुुओं की मदद की जा सके.

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