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प्रयाग में त्याग, तपस्या और दान का ‘कल्पवास’

इलाहाबाद. तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती की रेती पर कल से शुरू हो रहे पौष पूर्णिमा माघ मेले में त्याग, तपस्या और दान के ‘कल्पवास’ का जमावडा शुरू होने से संगम तट गुलजार हो गया है. त्रिवेणी के संगम पर बसने वाली अस्थायी आध्यात्मिक नगरी में जप, तप, होम, यज्ञ, धूनी की बयार और संतों के प्रवचन आदि गतिविधियां एवं अन्य क्रिया कलाप एक मास तक तीर्थयात्रियों और कल्पवासियों को बांधे रखती हैं. यहां विभिन्न संस्कृतियां, धर्म और विभिन्न विचारधाराओं का भी संगम होता है. विभिन्न प्रांतों से आये तीर्थयात्री आपस में विचार विमर्श कर सूचनाओं एवं ज्ञान का आदान प्रदान करते हैं. यह वसुधैव कुटुम्बकम का प्रतीक है. पापनाशिनी और मोक्षदायिनी विहंगम गंगा तट पर हाड कंपाने वाली सर्दी में पूरे एक महीने तक कल्पवासी तीन बार स्नान, जमीन पर शयन, जप, तप, होम, यज्ञ कर साधु-संतो के धूनी की मनमोहनक सुगंध में प्रवचन का श्रवण, एक समय भोजन या फलाहार कर कल्पवास करेंगे. इस दौरान कल्पवासी या तीर्थयात्री अन्न, काला तिल,ऊन, वस्त्र एवं बर्तन आदि का दान करते हैं. वैदिक शोध एवं सांस्क़ृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण के आचार्य डा आत्मराम गौतम ने बताया कि महाभारत, रामचरितमानस और पद्मपुराण में प्रयाग के महात्म का वर्णन है. महाभारत में कहा गया है कि एक सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने का जो फल है, माघ मास में कल्पवास करने भर से प्राप्त हो जाता है. एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं, “राजन प्रयाग तीर्थ सब पापों को नाश करने वाला है. प्रयाग में जो भी व्यक्ति एक महीना, इंद्रियों को वश में करके स्नान-ध्यान, पूजा-पाठ, यज्ञ और संतो के सानिध्य में प्रवचन करने और श्रवण से मोक्ष प्राप्त होता है. आचार्य ने बताया कि कल्पवास दो प्रकार का होता है. पहला चंद्रमास और दूसरा शौर्य मास का कल्पवास. पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक चंद्रमास का कल्पवास रहता है और मकर संक्रांति से कुंभ संक्रांति तक शौर्य मास. कल्पवास को धैर्य, अहिंसा और भक्ति के लिए जाना जाता है. उन्होंने बताया कि पुराणों में ‘प्रयागराज’ को सभी तीर्थो का राजा कहा गया है. अयोध्या, मथुरा, मायापुरी, काशी, कांची, उज्जैन, और द्वारका ये सात परम पवित्र नगरी मानी जाती हैं. ये सातों तीर्थ महाराजाधिराज प्रयाग की पटरानियां हैं. इन्हीं सब कारणों से भूमण्डल के समस्त तीर्थो में प्रयागराज सर्वश्रेष्ठ है. यहां माघ मकर में प्रतिवर्ष एक महीने का बड़ा मेला लगता है. मेले में आने वाले करोड़ो श्रद्धालु पतित पावनी गंगा में आस्था की डुबकी लगाते हैं. यहां एक महीने के कल्पवास का बहुत महात्म है. मान्यता है कि स्वर्ग में निवास करने वाले देवता भी दुर्लभ मनुष्य का जन्म पाकर प्रयाग क्षेत्र में कल्पवास करने की इच्छा करते हैं. मान्यताओं के अनुसार माघ महीने में प्रयाग में न सिर्फ लोग कल्पवास करते हैं, बल्कि 33 करोड़ देवी-देवता भी वहीं रहते हैं. कल्पवास करने वाले साधकों को वो किसी न किसी रूप में दर्शन देते हैं. आचार्य ने बताया कि तुलसीदास ने लिखा है कि “भरद्वाज मुनि बसहि प्रयागा, तिनहिं रामपद अति अनुरागा. माघ मकरगति रवि जब होई, तीरथपतिहि आव सब कोई. देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिवेनी.” एक प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री गौतम ने बताया कि कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि भी होती है. बहुत से श्रद्धालु जीवनभर माघ मास गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम को समर्पित कर देते हैं. विधान के अनुसार एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर कल्पवास किया जा सकता है. कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है. कल्पवास का विधान हज़ारों वर्षों से चला आ रहा है. जब तीर्थराज प्रयाग में कोई शहर नहीं था तब यह भूमि ऋषियों की तपस्थली थी. प्रयाग में गंगा-यमुना के आसपास घना जंगल था. इस जंगल में ऋषि-मुनि ध्यान और तप करते थे. ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा. उनके अनुसार इस दौरान गृहस्थों को अल्पकाल के लिए शिक्षा और दीक्षा दी जाती थी. इस दौरान जो भी गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आया है वह झोपड़ियों (पर्ण कुटी) में रहता था. उन्होंने पद्म पुराण का हवाला देते हुए बताया कि देवता भी मानव तन पाकर यहां कल्पवास करने की इच्छा रखते है. त्रिवेणी तट पर कल्पवास करने वाले कल्पवासी को सुबह गंगा-स्नान के बाद पर्णकुटी (टेंट) में पूजा-पाठ से दिनचर्या शुरू कर संध्या वंदन करते देर रात तक प्रवचन और भजन-कीर्तन जैसे आध्यात्मिक कार्यों को करते रहना चाहिए. इस दौरान दिन में एक ही बार भोजन या फलाहार करना चाहिए तथा मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभावपूर्ण रहना चाहिए. आचार्य गौतम ने बताया कि कल्पवास शब्द का प्रयोग पौराणिक ग्रन्थों में ही किया गया है, तथापि माघकाल में संगम के तट पर वास कल्पवास के नाम से अभिहित है. कल्पवास, पौष शुक्ल एकादशी से आरम्भ होकर माघ शुक्ल द्वादशी पर्यन्त एकमास तक का विधान है. कुछ लोग पौष पूर्णिमा से कल्पवास आरम्भ करते हैं. संयम, अहिंसा एवं श्रद्धा ही ‘कल्पवास’ का मूल है. प्रयाग में कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है. यहां त्रिवेणी तट पर कल्पवास हर वर्ष माघ मास के दौरान पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक किया जाता है. कुंभ और अर्धकुंभ मेले के अलावा यहां हर वर्ष माघ मेला लगता है. कल्पवास माघ, कुंभ और अर्धकुंभ सभी अवसरों पर होता है. ‘कल्पवास’ के अर्थ के संदर्भ में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार एक ‘कल्प’ कलि युग, सतयुग, द्वापर और त्रेता चारों युगों की अवधि होती है और प्रयाग में नियमपूर्वक संपन्न एक कल्पवास का फल चारों युगों में किये तप, ध्यान, दान से अर्जित पुण्य फल के बराबर होता है. हालांकि तमाम समकालीन विद्वानों का मत है कि ‘कल्पवास’ का अर्थ ‘कायाशोधन’ होता है, जिसे कायाकल्प भी कहा जा सकता है. संगम तट पर महीने भर स्नान-ध्यान और दान करने के उपरांत साधक का कायाशोधन या कायाकल्प हो जाता है, जो कल्पवास कहलाता है. अगर कुंभ के दौरान कल्पवास की परंपरा की बात की जाये, तो सबसे पहला उपलब्ध इतिहास चीनी यात्री ह्वेन-सांग के यात्रा विवरण में मिलता है. ह्वेन-सांग सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में (617-647 ई.) के दौरान भारत आया था. सम्राट हर्षवर्धन ने ह्वेन-सांग को अपना अतिथि बनाया था. सम्राट हर्षवर्धन उन्हें अपने साथ तमाम धार्मिक अनुष्ठानों में ले जाया करते थे. ह्वेन-सांग ने लिखा है, ‘सम्राट हर्षवर्धन हर पांच साल बाद प्रयाग के त्रिवेणी तट पर एक बड़े धार्मिक अनुष्ठान में भाग लेते थे जहां वो बीते सालों में अर्जित अपनी सारी संपत्ति विद्वानों-पुरोहितों, साधुओं, भिक्षकों, विधवाओं और असहाय लोगों में दान कर दिया करते थे. प्रयाग के संगम पर मकर संक्रांति और माघ में कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से है. इसका उल्लेख वेद और शास्त्रों में भी मिलता है. कल्पवास ऐसी साधना है, जिसके माध्यम से तीर्थराज प्रयाग में कल्पवासी महीने भर के लिए अपने सांसारिक सुख-दुख, माया-मोह, हानि-लाभ की चिंता छोडक़र सिर्फ परलोक के बारे में सोचते हैं. वह संयम और साधना के जरिए माया मोह छोडऩे का अभ्यास करते हैं. माघ मेला और कुम्भ मेला को धरती पर श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण मेला माना जाता है जिसमें जाति, पंथ या लिंग से इतर करोड़ों लोग हिस्सा लेते हैं.

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