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पौष पूर्णिमा स्नान से हुआ माघ मेले का आगाज,लाखों श्रद्धालुओं ने संगम में लगाई डुबकी

इलाहाबाद. उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ माघ मेला शुरू हो गया . इस मौके पर 25 लाख से अधिक श्रद्धालुओ ने संगम में डुबकी लगायी. मेले में विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और विविधताओं का संगम दिखायी पड़ रहा है. कड़ाके की ठंड और शीतलहरी पर आस्था का विश्वास भारी पड़ रहा है. त्रिवेणी के तट पर तेज हवा और कड़ाके की ठंड में पतित पावनी के जल में भोर चार बजे से ही श्रद्धालु ,कल्पवासी, तीर्थयात्री और सांधु-संतों ने ‘‘हर हर गंगे, ऊं नम: शिवाय, राम जयराम जय जय राम” का उच्चारण करते हुए स्नान शुरू कर दिया. यह सिलसिला शाम तक जारी रहेगा. माघ मेले के दौरान दूरदराज से आकर संगम तट पर कल्पवास करने वाले साधु-संत, सन्यासी, दिव्यांगों और गृहस्थों द्वारा किये जाने वाले भजन-कीर्तन की एक झलक पाने के लिए बडी तादाद में विदेशी सैलानियों का कहीं कहीं जमघट दिखायी पड़ा. भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रभावित कई विदेशी भी इस दौरान ‘पुण्य लाभ’ के लिए संगम स्नान करते नजर आए. देश के कोने कोने से पहुंचे माघ मेले के पहले स्नान पर लाखों श्रद्धालुओं ने गंगा, यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के पवित्र संगम में आस्था की डुबकी लगाई. मेला प्रशासन ने 30 लाख श्रद्धालुओं के स्नान करने का अनुमान लगाया है. दूसरा स्नान शनिवार 14 जनवरी मकर संक्रांति के अवसर पर 65 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है. कल्पवास करने वाले साधु-संत, सन्यासी, दिव्यांग और गृहस्थ स्नान कर घाट पर बैठे पण्डे और पुरोहितों को दान-दक्षिणा, पूजन-अर्चन के बाद मोह-माया से दूर एक माह तक व्रत, भजन, पूजन और प्रवचन के लिए अपने तम्बुओं में तल्लीन हैं. संगम तट पर श्रद्धालुओं के स्नान करने के लिए तैयार कराये गये 15 घाटों पर भीड़ लगी हुई है. भोर में स्नान करने वालों की भीड कम थी लेकिन दिन चढ़ने के साथ ही स्नान करने वालों की संख्या बढ़ती गयी. डुबकी लगाने वालों में महिलाएं, बच्चे, बूढ़े और दिव्यांग सभी शामिल हैं. स्नान के बाद श्रद्धालु घाट पर बैठे पण्डे और पुरोहितों को चावल, आटा, नमक, दाल, तिल, आदि का दान कर रहे हैं. मेले में विभिन्न संस्कृतियों, भाषाओं और विविधताओं का संगम भी देखने को मिल रहा है. देश के कोने कोने से लाखों श्रद्धालु पौष पूर्णिमा के पहला स्नानकर खुद को धन्य मान रहे हैं. कड़ाके की ठंड और शीतलहरी पर विश्वास की आस्था भारी पड रही है. प्राचीन काल से संगम तट पर जुटने वाले माघ मेले की जीवंतता में आज भी कोई कमी नहीं आयी है. मेले में आस्था और श्रद्धा से सराबोर पुरानी परम्पराओं के साथ आधुनिकता के रंग-बिरंगे नजारे दिखायी पड़ रहे हैं. भारतीय संस्कृति और आध्यात्म से प्रभावित कई विदेशी भी इस दौरान ‘पुण्य लाभ’ के लिए संगम स्नान करते दिखायी दिये. सभी कल्पवासी अपने-अपने शिविरों में बस चुके हैं. मेला क्षेत्र में चारों ओर ‘ऊं नम: शिवाय’ ‘जय-जय राम जय सिया राम’ के मधुर संगीत मेला क्षेत्र को आनंदित कर रही है. एक तरफ जहां नदियों का संगम है वहीं दूसरी तरफ तम्बुओं के अन्दर से आध्यत्म की बयार बह रही है. चारों ओर धार्मिक अनुष्ठानों के मंत्रोच्चार और हवन में प्रवाहित की जा रही सामग्रियों की भीनी -भीनी खुशबू मेला क्षेत्र के वातावरण को पवित्र और सुगन्धित कर रही है. माघ मेला और कुंभ मेला भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध है. यह मेला आज से शुरू होकर 43 दिनों तक चलेगा. माघ मेले को मिनी कुंभ भी कहा जाता हैं.

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