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मधुमेह का सरल और प्रभावी समाधान ग्लाइसेमिक पेन्टैड

नयी दिल्ली. देश और दुनिया में तेजी से बढ़ रही मधुमेह (डायबिटीज) के बारे में ताजा अध्ययनों से यह सामने आया है कि रोगी के खून की जांच के साथ-साथ यदि उसकी जीवन शैली और ग्लाइसेमिक उतार चढ़ाव को उपचार में शामिल कर लिया जाये तो इस पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सकता है. मधुमेह या डायबिटीज के उपचार एवं प्रबंधन के लिए ज्यादातर खून की जांचों एफपीजी, पीपीजी और एचबीए1सी के आकलन पर ही ध्यान केंद्रित किया जाता रहा है लेकिन अब इसमें रोगी के ग्लाइसेमिक वैरीएब्लिटी और जीवन की गुणवत्ता को भी शामिल किया जाने लगा है. इन सभी को सामूहिक नाम ग्लाइसेमिक पेन्टैड (मधुमेह उपचार हेतु पांच फोकस क्षेत्र) दिया गया है जो इस रोग के नियंत्रण और प्रबंधन में महत्वपूर्ण साबित हो रहा है. डायबिटीज एंड ओबेसिटी सेंटर के डॉ. ब्रिज मोहन मक्कड़ के अनुसार ग्लाइसेमिक वैरिएबिलिटी किसी भी व्यक्ति के ब्लड ग्लूकोज में दैनिक उतार-चढ़ाव को बताता है. वहीं जीवन गुणवता में व्यक्ति का शारीरिक, भावनात्मक एवं सामाजिक स्वास्थ्य शामिल है. साथ ही इसमें व्यक्ति के जीवन में भावनात्मक तत्व जैसे संतुष्टि और प्रसन्नता भी शामिल हैं. मधुमेह के रोगियों में जीवन गुणवत्ता के इन तत्वों की कमी पायी जाती है. इसलिए मधुमेह के उपचार एवं प्रबंधन में ग्लाइसेमिक वैरीएब्लिटी और जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी हो जाता है. ऐसा करने पर इसके अच्छे परिणाम सामने आते हैं. मधुमेह का शिकार होने पर रक्त में शर्करा स्तर लंबे समय तक उच्च बना रहता है. बार-बार पेशाब आना, भूख और प्यास में बढ़ोतरी, हमेशा थकान बने रहना, घाव देरी से भरना इत्यादि इसके प्रमुख लक्षण हैं. मधुमेह का समय पर उपचार न किया जाए तो शरीर कई अन्य बीमारियों का घर बन जाता है. इससे हृदय रोग, स्ट्रोक, किडनी फेल होना, आंखों की रोशनी कम होना और अल्सर जैसे गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. मधुमेह का स्तर बढ़ने पर व्यक्ति के कोमा में जाने और मौत तक की आशंका रहती है. डा़ॅ मक्कड़ के अनुसार मधुमेह होने का सटीक कारण का अभी तक पता नहीं चल पाया है, लेकिन कुछ आनुवांशिक एवं जीवनशैली से संबंधित कारक ब्लड शुगर के स्तर को बढ़ाते हैं. मोटे तौर पर मधुमेह के कारणों में अनुवांशिक कारण, व्यायाम की कमी, खराब आहार, मोटापा, इंसुलिन में परिवर्तन, गर्भावस्था में मधुमेह, खराब जीवन शैली इत्यादि शामिल हैं. पाचन के दौरान ग्लूकोज हमारे खून से होकर कोशिकाओं तक पहुंचता है. ब्लड शुगर को कोशिकाओं में पहुंचाने में शरीर को इंसुलिन की जरूरत पड़ती है. पैन्क्रियाज (पाचन ग्रंथि) इंसुलिन उत्पन्न करती है और उसे खून तक पहुंचाती हैं. यदि शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन उत्पन्न नहीं कर पाता है अथवा इंसुलिन बनाने में शरीर को परेशानी होती है तो रक्त के अंदर का ग्लूकोज वहीं पर रह जाता है और इससे खून में शुगर का स्तर बढ़ जाता है. यदि खान-पान को नियंत्रित करने के बावजूद यही लक्षण बने रहते हैं तो वह मधुमेह रोग की शक्ल ले लेता है. मधुमेह को मुख्यतः दो श्रेणियों टाइप 1 और टाइप 2 में रखा जाता है. टाइप 1 में शरीर में इंसुलिन बनना बंद हो जाता है. शरीर की श्वेत रक्त कोशिकाएं अग्नाशय की इंसुलिन बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देती हैं. वहीं टाइप 2 में इंसुलिन काफी कम मात्रा में बनता है और जो इंसुलिन बनता है उसका भी सही तरीके से इस्तेमाल नहीं हो पाता. इसके कारण ग्लूकोज कोशिकाओं में नहीं जाता और रक्त में उसकी मात्रा बढ़ जाती है. टाइप 2 मधुमेह जैसे जैसे बढ़ता है, इंसुलिन की कमी भी बढ़ती जाती है. वहीं गर्भावस्था में मधुमेह का तीसरा मुख्य टाइप माना जाता है. इसमें गर्भावस्था के दौरान शरीर में शर्करा का स्तर बढ़ जाता है. मधुमेह से बचाव के लिए हमें अपनी जीवन शैली और खान-पान की आदतों को सही रखना बेहद जरूरी होता है. नियमित रूप से व्यायाम, पर्याप्त नींद, मोटापा कम करना, तनाव से दूर रहना, धूम्रपान और शराब से दूर रहना, सुपाच्य और पौष्टिक भोजन करना इत्यादि शामिल हैं. देश में मधुमेह के 55 विशेषज्ञों को शामिल कर ग्लाइसेमिक पेन्टैड फोरम की स्थापना की गयी है. विशेषज्ञों ने मधुमेह से संबंधित विभिन्न विषयों पर चर्चा और अपने अनुभवों को साझा कर मधुमेह प्रबंधन में ग्लाइसेमिक पेन्टैड की प्रासंगिकता को रेखांकित किया है. उनकी आम राय है कि एफपीजी, पीपीजी, एचबीए1सी के अलावा ग्लाइसेमिक वैरीबलिटी और जीवन गुणवत्ता को मधुमेह के उपचार एवं प्रबंधन के लिए जरूरी है. फोरम का मानना है कि भारतीयों के मधुमेह के उपचार एवं प्रबंधन में व्यक्तिगत आहार आदतों और उनके सामाजिक आर्थिक स्तर पर भी ध्यान दिये जाने की जरूरत है.

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