भारत में प्रयोगशाला में बनेंगे ‘हीरे’ | Navabharat - Hindi News Website
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भारत में प्रयोगशाला में बनेंगे ‘हीरे’

नयी दिल्ली. अपनी खूबसूरती से हर एक दिल जीत लेने वाले हीरे के बेशकीमती होेने तथा जमीन से इसे निकालने की जटिल प्रक्रिया के चलते इसका सस्ता विकल्प तलाशा जा रहा है. दुनियाभर के कई देशों की तरह अब भारत में भी प्रयोगशाला में कृत्रिम हीरा तैयार करने की तकनीक पर काम हो रहा है. अमेरिका, यूरोपीय यूनियन, रूस, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जापान और सिंगापुर जैसे कई विकसित देशों में लैब डायमंड बनाने की न सिर्फ आधुनिक तकनीक मौजूद है बल्कि ये देश बड़े पैमाने पर इस कृत्रिम हीरे को बाज़ार में उतार रहे हैं. भारत और चीन दुनिया में हीरे के सबसे बड़े उपभोक्ता देश हैं. ऐसे में भारतीय वैज्ञानिक भी प्रयोगशाला में हीरा विकसित करने की तकनीक पर काम कर रहे हैं जो निकट भविष्य में बड़ी जनसंख्या के लिये सस्ता विकल्प होगा. देश में मुख्य रूप से रत्नों की रंगाई एवं रत्न अभिनिर्धारण प्रक्रिया, प्राकृतिक रत्नों का रूपांतरण और डायमंड कोटिंग जैसी तकनीक पर काम तेजी से हो रहा है. इसमें कीमत रत्नों जैसे माणिक, जिक्रोन, नीलम, पन्ना, स्फटिक ,हीरा आदि के खनन के दौरान नष्ट होने पर भी इन्हें वैज्ञानिक तकनीक से लैब में उपयोग लायक बनाने पर काम हो रहा है. वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के खनिज एवं पदार्थ प्रोद्योगिकी संस्थान (आईएमएमटी) भुवनेश्वर के कार्यवाहक निदेशक एस के मिश्रा ने यूनीवार्ता को बताया कि उनका संस्थान हीरा विकसित करने की नयी तकनीक डायमंड कोटिंग पर काम रहा है. देश में हीरा बनाने की सीवीडी तकनीक पर आईएमएमटी भुवनेश्वर, सीजीसीआरआई कोलकाता, आईआईटी मद्रास चेन्नई, आईआईटी मुंबई, बीआईटी-मेसरा रांची, टेक्नोस इंस्ट्रूमेंट जयपुर में शोध हो रहा है. उन्होंने बताया कि इस तकनीक में हीरे के बेहद सूक्ष्म(माइक्रोस्कोपिक) कण को माइक्रोवेव प्लास्मा सीवीडी रिएक्टर प्रक्रिया के तहत बड़े आकार तक बढ़ाया जाता है जिसे डायमंड कोटिंग या डिपोजिशन तकनीक कहा जाता है. यह काफी जटिल प्रक्रिया है जिसमें रिएक्टर में मीथेन गैस को इस तेजी से डाला जाता है जिससे कार्बन एटम निकलते हैं और उसे तब तक प्रोसेस किया जाता है कि वह उस कण के साथ मिलकर हीरे को बड़े आकार में पहुंचा देता है. मिश्रा ने बताया कि मीथेन गैस भले ही बायो गैस का मुख्य घटक है लेकिन यह हीरे को भी बड़ा करने में मदद करती है. लैब डायमंड के लिये एटोमिक हाइड्रोजन भी अहम है जिसे माइक्रोवेव प्लास्मा से बनाया जाता है. वैसे हाईड्रोजन अणु हीरे के कण का हिस्सा नहीं बनते लेकिन इस प्रक्रिया में उनकी उपस्थिति अहम होती है. लैब डायमंड एक जटिल प्रक्रिया है जिसमें हीरे का एक मिलीमीटर आकार का कण बनाने में भी कई सप्ताह लगते हैं. लेकिन एक आकार पाने के बाद इसे डोपिंग बोरोन या अन्य तकनीकों से हीरे को विभिन्न रंग दिये जा सकते हैं जो प्राकृतिक रूप से मिलने वाले महंगे रंगीन हीरों जैसे नीलम, ड्रैसडन ग्रीन डायमंड जैसे हीरों की चाह भी पूरी कर सकता है. धरती की गोद से हीरा निकालने के बजाय इसे प्रयोगशाला में बनाने पर वैज्ञानिकाें ने 1879 से 1928 के बीच काफी शोध किया था और 1954 में अमेरिका में जनरल इलेक्ट्रिक्स(जीई) ने एचपीएचटी तकनीक से दुनिया का पहला कृत्रिम हीरा तैयार किया था.

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