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क्या है घरेलू हिंसा अधिनियम

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महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों को रोकने के लिए भारत सरकार द्वारा पूरे भारत वर्ष में घरेलू हिंसा संरक्षण अधिनियम लागू किया गया. जिसके इस अधिनियम के अन्तर्गत पहली बार घरेलू संबंधों और घरेलू हिंसा को स्पष्ट् और परिभाषित किया गया है.बहिन, विधवा, मॉ, बेटी, अकेली अविवाहित महिला आदि को भी इस अधिनियम के अन्तर्गत राहत हेतु घरेलू संबंधों में सम्मिलित किया गया है. इसके आलावा ‘साझा घर’ को भी परिभाषित किया गया है ताकि प्रताड़ित महिला को निवास संबंधी सुविधा दी जा सकें.
घरेलू हिंसा की परिभाषा -इस अधिनियम में घरेलू हिंसा शब्द का व्यापक अर्थ लिया गया है. इसमें प्रार्थी  का कोई भी ऐसा कार्य, लोप या आचरण घरेलू हिंसा कहलाएगा, यदि वह व्यथित व्यक्ति (पीड़ित) के स्वास्थ्य की सुरक्षा, जीवन, उसके शारीरिक अंगों या उसके कल्यापण को नुकसान पहुंचाता है या क्षतिग्रस्त करता है या ऐसा करने का प्रयास करता है. इसमें व्यथित व्यक्ति(पीड़िता) का शारीरिक दुरूपयोग, शाब्दिक या भावनात्मक दुरूपयोग और आर्थिक दुरूपयोग शामिल है. जिसमें जिला मजिस्ट्रेट द्वारा किसी प्रकरण में परामर्शदाता नियुक्त करने हेतु जिलों में परामशर्दाताओं की सूची उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास विभाग (जिला संरक्षण अधिकारी) द्वारा तैयार की जाती है. व्यथित महिलाओं को तुरंत राहत पहुंचाने आदि के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रावधान किया गया है.
पीड़ित महिला किससे सम्पर्क करे -अगर कोई महिला अपने परिवार द्वारा हो रहे घरेलू हिंसा से परेशान है तो स्वंय जाकर या एक पत्र के द्वारा उस क्षेत्र के संरक्षण अधिकारी से सम्पर्क कर सकती है.(संबंधित उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास, बाल विकास परियोजना अधिकारी एवं प्रचेता) सेवा प्रदाता संस्थाए से , पुलिस स्टेशन से, किसी भी सहयोगी के माध्यम से अथवा स्वयं सीधे न्यायालय में प्रार्थना पत्र दे सकती है.
पीड़ित महिला को राहत कैसे मिलेगी-इस अधिनियम के अन्तर्गत व्यथित महिला को मजिस्ट्रेट उसके संतान या संतानों को अस्थाई अभिरक्षा, घरेलू हिंसा के कारण हुई किसी क्षति के लिए प्रतिकार आदेश एवं आर्थिक सहायता के लिए आदेश दे सकते हैं साथ ही आवश्यकता पड़ने पर ‘साझा घर’ में निवास के आदेश भी दिए जा सकते हैं अर्थात एक ही छत के नीचे रहने के लिए बाध्य किया जाता है.अधिनियम की धारा 33 के अन्तर्गत न्यायलय द्वारा पारित संरक्षण आदेश की अनुपालना नहीं करने पर दोषी को एक वर्ष तक का दंड एवं बीस हजार रूपये तक का जुर्माना या दोनों का दंड दिया जा सकता है. इस अधिनियम के तहत यह ध्यान दिया जाता है कि प्रार्थी ने किस व्यक्ति पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है साथ ही यह भी देखा जाता है कि यह कोई वैचारिक मतभेद के तहत तो नही किया जा रहा है.वर्तमान में यह भी सोचने का विषय है की इस अधिनियम का बहुत अधिक दुरूप्रयोग भी देखने मिल रहा है.

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