चतुर पीलू
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- Friday, 24 May 2013 01:18
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फंटू शेर जब से नीलवन का राजा बना था तब से वहां के सभी जानवरों में असंतोष फैलने लगा था. फंटू नीलवन के पहले राजा शेरसिंह को धोखे से कैद कर खुद राजा बन बैठा था. वह अंधविश्वासी भी बहुत था. उसके दो मंत्री गेजू लोमड़ और चंदू रीछ तो उससे भी दो कदम आगे थे. वे खुलेआम निरीह जानवरों को मारकर खा जाते थे. पीलू बंदर से अपने वन की दुदर्शा देखी नहीं गई. पीलू के दिमाग में एक तरकीब आई. उसने अपने दोस्त बीनू बाज को अपनी योजना बताई तो वह पीलू की मदद के लिए राजी हो गया. सुबह जब फंटू शेर नहा रहा था तो बीनू उसके कमरे से सोने का हार-अंगूठी अपने पंजों में दबाये चुपचाप वहां से उड़ गया. दोनों आभूषण उसने पीलू को सौंप दिए. फंटू जब नहाकर अपने कमरे में लौटा तो अपना हार...
पेंटिंग का इतिहास
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- Friday, 17 May 2013 04:22
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जापान में कहा जाता है कि यदि तुम किसी बांस का चित्र बनाना चाहते हो तो पहले तुम्हें वह बांस बनना होगा अन्यथा तुम इसका चित्र कैसे बना सकते हो? तुम्हें उसके भीतर का कुछ अनुभव नहीं है और चित्रकारी और फोटोग्राफी में यही अंतर है. फोटोग्राफी तो जानकारी मात्र है क्योंकि कैमरा भीतर नहीं ले जा सकता. यह बाहर ही रहता है. यह दर्शक रहता है यह उसका अंश नहीं बन...
बंटी की आइसक्रीम
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- Friday, 17 May 2013 04:19
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बंटी आज जब स्कूल से आया तो फिर उसने घर पर ताला देखा. घर की सीढ़ियों पर वह अपना बैग रख कर बैठ गया. उसे भूख लगी थी और वह थका हुआ भी था. वह सोचने लगा, काश मेरी माँ भी राजू की माँ की तरह ही घर पर ही होती. मैं स्कूल से आता तो मुझे स्कूल के हाल-चाल पूछती, मेरे लिये गरम-गरम खाना बनाती और मुझे प्यार से खिलाती. सचमुच कितना खुशनसीब है राजू! इन्ही विचारों में...
मां के आंचल में
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- Friday, 10 May 2013 00:21
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रिंकू बहुत शरारती बालक था. पतंग उड़ाने का उसे बेहद शौक था. कड़कती दोपहर में वह छत पर चढ़कर पतंग उड़ाता. पतंग लूटने के लिए वह दीवारें बिल्ली की तरह फांद जाता. सारे घर वाले उसकी इस आदत से बहुत परेशान थे. मां अकसर उसे समझातीं. पिता भी बार-बार चेतावनी देते, पर उनकी बातों पर वह बिल्कुल ध्यान नहीं देता था. अगस्त का दिन था. रिंकू आज बहुत प्रसन्न था. अपने...
लालच
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- Friday, 03 May 2013 02:25
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बहुत पुरानी बात है. कंचनपुर के एक धनी व्यापारी के रसोईघर में एक कबूतर ने घोंसला बनाया हुआ था. एक दिन एक लालची कौआ उधर आ निकला. वहां मछली को देखकर उसके मुंह में पानी भर आया. तब उसने सोचा, मुझे इस रसोईघर में घुसना चाहिए, पर कैसे? तभी उसकी निगाह कबूतर पर जा पड़ी. उसने सोचा कि यदि मैं कबूतर से दोस्ती कर लूं तो शायद बात बन जाए. कबूतर जब दाना चुगने बाहर...
कर्ज
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- Tuesday, 09 April 2013 17:13
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आशुतोष और मैं दोनों सहकर्मी थे. दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्र के दफ्तर में नियुक्ति थी. छोटा-सा नगर था. सुविधाएँ बहुत कम थीं. इतनी दूर की नियुक्ति को विभाग में सजा के तौर पर ही देखा जाता था. खाना हम दोनों में से किसी को भी पकाना नहीं आता था. इसलिए हमने दफ्तर के पास ही एक चाय वाले को हमारे लिए खाना बनाने के लिए मना लिया था. सुबह नाश्ता हम अपने कमरे में ही...
वरदान
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- Thursday, 04 April 2013 22:22
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वाराणसी की पावन नगरी में लालू सेठ नाम का एक महाजन रहता था. उसने अपने जीवन में कभी एक पैसे का भी दान नहीं किया. उसकी पत्नी मंगू बाई उसे बार-बार निकटस्थ स्थानों की तीर्थ यात्रा करने के लिए कहती रहती, किन्तु लालू उसे मुँहतोड़ जवाब देता, ‘‘भगवान शिव का अपमान करने का साहस कैसे तुम करती हो? क्या वे वाराणसी के अधिष्ठाता प्रभु नहीं हैं? यहॉं...
बुद्धिमान बंजारा
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- Thursday, 28 March 2013 21:02
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एक बनजारा था.वह बैलों पर मेट (मुल्तानी मिट्टी) लादकर दिल्ली की तरफ आ रहा था. रास्ते में कई गाँवों से गुजरते समय उसकी बहुत-सी मेट बिक गयी. बैलों की पीठ पर लदे बोरे आधे तो खाली हो गये और आधे भरे रह गये. अब वे बैलों की पीठ पर टिकें कैसे ? क्योंकि भार एक तरफ हो गया ! नौकरों ने पूछा कि क्या करें ? बनजारा बोला—‘अरे ! सोचते क्या हो,...
उधार का भाग्य
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- Wednesday, 20 March 2013 21:04
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प्रकाश माइक के पास पहुँचे. उन्होने सामने बैठी और खड़ी भीड़ को देखा और बोलना शुरु किया. आज मैं अंतिम बार इस स्कूल के प्रिंसीपल के रुप में आप सबसे बात कर रहा हूँ. इसी जगह खड़े होकर मैंने बरसों भाषण दिये हैं. आज जब मेरी नौकरी का अंतिम दिन है तो मैं सोचता हूँ कि इस शिक्षण संस्थान की नौकरी से तो मुक्ति मिल रही है पर क्या कल से मेरे...
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