पापा! लगी तो नहीं
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- Wednesday, 02 January 2013 18:49
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बच्चे का जन्म नजदीक आने पर रामसिंह अपनी पत्नी को उसके मायके छोड़, घर वापस जाते हुए कह गया कि, "सुनीता! इस बार भी लड़की हुई तो मैं तुझे लेने नहीं आऊँगा, यहीं पर रहना." परिवार की प्रार्थनाओं की कोई सुनवाई न हुई. वही हुआ जिसका डर था. रामसिंह के इंतजार में तीन वर्ष निकल गए. भागती-फिरती पिंकी कई बार अपने पापा के बारे में पूछ लेती. लेकिन माँ और नानी का उदास चेहरा देख, वह चुप रह जाती. उधर रामसिंह के परिवार व मुहल्ले के लोगों ने उसे अपनी पत्नी व बेटी को लेने भेज ही दिया. बस स्टेशन से गाँव की दूरी तीन किमी की थी. स्टेशन पर बैठकर ही तीनों ने चाय-पानी पीया. रामसिंह ने वहाँ से एक कुदाली खरीद ली. बोला, "पुरानी टूट गई, यहाँ से बढ़िया मिल जाती है. मां-बेटी को साथ ले रामसिंह गाँव की ओर चल दिया. आधा रास्ता तय कर तीनों एक शीशम के वृक्ष की छाँव में बैठ गए. रामसिंह थोड़ी दूर जाकर एक गढ़ा खोदने लगा. उसने मन में सोच रखा था कि लड़की को गाँव नहीं लेकर जाएगा. गला दबा कर मार देगा और यहीं गड्डे में गाड़कर चला जाएगा. ऐसे विचारों में खोए रामसिंह का ध्यान बँट गया. कुदाली ज़मीन में दबे एक पत्थर से टकरा कर उसकी टाँग पर जा लगी. दर्द से बेहाल वह वहीं बैठ गया. तभी कान के पास एक तोतली-सी मीठी आवाज़ सुन वह चौंक पड़ाः
"पापा! लगी तो नहीं? लाओ फूक माल दूँ…थीक हो जाएगा…"
रामसिंह की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह चले. उसने बेटी को गले से लगा लिया.





